भगत सिंह का जीवन परिचय//Shahid Veer Bhagat Singh biography in Hindi

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भगत सिंह का जीवन परिचय//Shahid Veer Bhagat Singh biography in Hindi

भगत सिंह का जीवन परिचय//Shahid Veer Bhagat Singh biography in Hindi 

भगत सिंह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जो देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए। भगत सिंह की सहादत उस समय हुई थी, जब देश को क्रांति की सुनामी की सख्त जरूरत थी। और वही सुनामी अंग्रेजों के शासन के तबाही का कारण बनी है। उनकी शहादत से ना केवल देश के युवाओं में बल्कि बच्चे बच्चे में अंग्रेजो के खिलाफ था।

भगत सिंह का जीवन परिचय//Shahid Veer Bhagat Singh biography in Hindi
भगत सिंह का जीवन परिचय//Shahid Veer Bhagat Singh biography in Hindi 

Table of contents


भगत सिंह कौन थे तथा उनका परिचय दीजिए?

भगत सिंह का नारा कौन सा है?

भगत सिंह को फांसी की सजा क्यों दी गई?

भगत सिंह ने भारत में क्या योगदान दिया?

गांधी ने भगत सिंह को क्यों नहीं बचाया?

भगत सिंह ने कितने दिन भूख हड़ताल की थी?

भगत सिंह की मृत्यु कब हुई थी?

भगत सिंह का मुख्य नारा क्या है?

भगत सिंह को क्यों मारा था?

FAQ


यही नहीं भारत की आजादी के समय भगत सिंह सभी नौजवानों के लिए यूज आईकॉन थे, जो उन्हें देश की रक्षा के लिए आगे आने के लिए प्रेरित करते थे। महान क्रांतिकारी भगत सिंह का जीवन भी वाकई प्रेरणा देने वाला है, जिन्होंने अपने बेहद कम समय के ही जीवन काल में अटूट संघर्ष देखा था। दोस्तों आपको अगर यह पोस्ट पसंद आए तो दूसरों को शेयर जरूर करें।


जीवन परिचय

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1960 को पंजाब के बंगा नामक गांव (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता किशन सिंह संधू तथा माता विद्यावती थी। वह अपने पिता की दूसरी संतान थे। भगत सिंह के तीन भाई व तीन बहने थी। भगत सिंह के पिता व चाचा अजीत सिंह भी राष्ट्र की स्वतंत्रता में सक्रिय थे। उनके करण सभी देश भक्ति के प्रति प्रेरित हुए।


शिक्षा

सरदार भगत सिंह ने कुछ वर्षों तक बंगा के गांव के स्कूल में पढ़ने के बाद लाहौर के दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल में पढ़ाई की। 1923 में, उन्होंने लाहौर में नेशनल कॉलेज (लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित) मैं प्रवेश लिया, जहां उन्होंने यूरोपीय क्रांतिकारी आंदोलन का अध्ययन किया।


भगत सिंह एक मेधावी छात्र थे जिन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किए। भगत सिंह ने मार्च 1926 में भारतीय समाजवादी युवा संगठन नौजवान भारत सभा की स्थापना की उन्होंने कई दैनिक समाचार पत्रों के लिए भी लिखा और काम किया और अन्य क्रांतिकारी सेनानियों के  साथ जुड़े रहे।


जॉन सांडर्स की हत्या में भागीदारी

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता लाला लाजपत राय को पूरे भारत में पंजाब केसरी के नाम से जाना जाता था।


राय व उनके क्रांतिकारियों ने साइमन कमीशन गो बैक के नारे लगाए जिसके बाद जेम्स स्कॉट नाम के अंग्रेज अधिकारी ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करने का आदेश दिया। इस लाठीचार्ज में पुलिस ने लाला लाजपत राय पर व्यक्तिगत हमले किए। पुलिस द्वारा किए गए हमलों से 17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय की ह्रदयघाट के कारण मृत्यु हो गई।


लाला लाजपत राय की मृत्यु होने से क्रांतिकारियों में द्वेष फैल चुका था। और उन्होंने उनकी मृत्यु का बदला लेने की ठान ली। चंद्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन संगठन का नाम बदलकर के हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन कर दिया था। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने की सौगंध ली।


भगत सिंह, सुखदेव वह राजगुरु ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश सरकार के पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी।


चानन सिंह की हत्या

जॉन सांडर्स की हत्या करने के बाद, क्रांतिकारियों का समूह डीएवी कॉलेज से जा रहा था। ब्रिटिश सरकार का एक भारतीय जन्मजात सैनिक क्रांतिकारियों के इस समूह का पीछा कर रहा था। उस सैनिक का नाम चानन सिंह था। चंद्रशेखर आजाद की गोली से चानन सिंह की हत्या हो गई।


पुलिस ने उस सभी क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए लाहौर के हर रास्ते पर नाकाबंदी लगा दी। क्रांतिकारी लाहौर के सुव्यवस्थित व सुरक्षित घरों में पहुंच चुके थे।


लाहौर से भागना

लाहौर में दो दिनों तक छिपे रहने के बाद, सुखदेव ने दुर्गावती देवी से मदद मांगी। को दुर्गा भाभी के नाम से भी जाना जाता था। सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन के ही 1 सदस्य की पत्नी थी। बठिंडा जाने वाली ट्रेन के माध्यम से लाहौर से बाहर जाने की योजना बनाई।


अगले दिन सुबह की भगत सिंह व राजगुरू भरे हुए पिस्तौल लेकर निकल पड़े। किसी भी ब्रिटिश पुलिस अधिकारी को पता ना चल जाए इसलिए भगत सिंह ने अपने बाल कटवा लिए, अपनी दाढ़ी बनवा ली और एक पश्चिमी रिवाज की टोपी भी पहन ली।


दुर्गा भाभी भगत सिंह पति पत्नी बन गए और नवजात बच्चे को साथ लेकर चल दिए। राजगुरु सामान उठाने वाला सेवक बन गया। तीनों वहां से कानपुर की ट्रेन में बैठ गए और कानपुर से लखनऊ चले गए। उसके बाद राजगुरू बनारस के लिए तथा सिंह व देवी अपने बच्चे के साथ हावड़ा की ओर चले गए। कुछ दिनों बाद सीन को छोड़कर के सभी वापस लाहौर आ गए।


असेंबली में बम का फेंका जाना

भगत सिंह रक्तपात करना नहीं चाहते थे, साथी वे यह भी चाहते थे अंग्रेजों को इस बात का एहसास हो जाना चाहिए कि भारत के लोग अब जाग चुके हैं और अब ज्यादा दिनों तक में अंग्रेजों को स्वीकार नहीं करेंगे अतः इसी बात का एहसास अंग्रेजों पर आने के लिए उन्होंने दिल्ली की  सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने का प्लान बनाया।


भगत सिंह की मंशा थी कि इस धमाके से कोई खून खराबा ना हो और उसकी तेज आवाज अंग्रेजी हुकूमत तक पहुंच जाए इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए सभी की सहमति से भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को चुना गया।


निर्धारित तिथि के अनुसार 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में इन दोनों ने एक खाली स्थान पर बम फेंका जहां कोई बैठा नहीं था, ताकि किसी को चोट ना पहुंचे। सेंट्रल असेंबली का पूरा हाल धुआं से भर गया।


यदि भगत सिंह और कोटेश्वर मदद चाहते तो वहां से भाग सकते थे। परंतु भगत सिंह उसी असेंबली में गिरफ्तार होकर अपनी आवाज पूरे देश और अंग्रेजी हुकूमत तक पहुंचाना चाहते थे, जो कि सोने की गिरफ्तारी देखकर ही संभव था।


भगत सिंह के साथी ही क्रांतिकारी पकड़े गए

1929 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन ने राहुल व सहारनपुर में बम फैक्ट्री की स्थापना की थी। 15 अप्रैल 1929 को लाहौर की बम फैक्ट्री के बारे में पुलिस को पता चला और उन्होंने इस फैक्ट्री के कुछ मुख्य सदस्य सुखदेव, किशोर लाल व जय गोपाल को गिरफ्तार कर लिया।


कुछ समय बाद ही सहारनपुर की बम फैक्ट्री का भी पता चल गया और कई कारण अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।


जॉन सांडर्स की हत्या, असेंबली पर किए गए हमले बम बम निर्माण का आपस में संबंध पता करने में पुलिस कामयाब हो गई थी। जिसके बाद उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु 21 अन्य क्रांतिकारियों को जॉन सांडर्स की हत्या का दोषी माना।


भूख हड़ताल और लाहौर षड्यंत्र

तमाम सबूतों और गवाहों हंसराज तथा जय गोपाल आदि सहयोग से अंग्रेजी हुकूमत ने भगत सिंह पर दोबारा कानूनी प्रक्रिया प्रारंभ कर दी। भरत सिंह को दिल्ली जेल से केंद्रीय जेल मैन्वाली रावलपिंडी जो कि अब पाकिस्तान में है भेज दिया। रावलपिंडी जेल में भगत सिंह ने देखा कि वहां भारतीय और अंग्रेज के दिनों में भेदभाव किया जाता है।


यहां तक कि खाने, और कपड़े देने में भी भारतीय कैदियों का साथ दोहरा बर्ताव किया जाता है। और भी लगभग हर मामले में यहां भारतीय कैदियों के साथ न्याय किया जाता था यह सब देखकर भगत सिंह चौक ना बैठ सके और विरोध करने का निर्णय लिया। भगत सिंह का कहना था कि जो राजनीतिक कैदी हैं इसलिए उन्हें राजनीतिक कैदियों की तरह रखा जाए।


सरदार भगत सिंह जेल में ही भूख हड़ताल पर बैठ गए जेल के अन्य भारतीय कैदियों ने भी भगत सिंह का साथ दिया। इस भूख हड़ताल का व्यापक असर हुआ, लाहौर और अमृतसर शहीद देश ने अनेकों हिस्सों में लोग सड़कों पर उतर कर विरोध करने लगे। अंग्रेजी हुकूमत को उनको जगह धारा 144 लगाने पर मजबूर होना पड़ा, अंग्रेजी हुकूमत ने भूख हड़ताल को तोड़ने के अनेकों प्रयास किए। तरह तरह के षड्यंत्र किए गए, जबरजस्ती होने वाली  हड़ताल खत्म हो सके मगर सफल नहीं हो पाए। उस समय के अंग्रेज गवर्नर इरविन को अपना अवकाश वापस लेना पड़ा और उन्होंने जेल प्रशासन से बातचीत कर मामले को शांत करने की कोशिश की मगर वह भी असफल रहे।


भगत सिंह का यह आंदोलन अब तक विकराल रूप ले चुका था। पूरे देश में लोगों के मन में आक्रोश पैदा हो रहा था, वही अंग्रेजी हुकूमत की परेशानी भी बढ़ती जा रही थी। अंग्रेजी हुकूमत ने फैसला किया कि भगत सिंह को दूसरे जेल भेजा जाए। उन्हें लाहौर स्थित ब्रोस्ताल जेल भेज दिया गया, और भगत सिंह के ऊपर कानूनी कार्रवाई तेज कर दी गई। भगत सिंह ने भूख हड़ताल खत्म नहीं की। उनके स्वास्थ्य में लगातार भयानक गिरावट आ रही थी उन्हें स्ट्रेचर से कोर्ट लाया जाता था। सरकार ने हड़ताल खत्म करने के इरादे से कैदियों को कुछ यदि आयते देने की घोषणा की मगर प्रमुख मुद्दे राजनीतिक कैदी का दर्जा देने से इनकार कर दिया।


इसी बीच एक साथी जितेंद्र नाथ दास की 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद 13 सितंबर 1929 को मौत हो गई। इस घटना ने पूरे देश में उबाल ला दिया, अंग्रेजी सरकार की चूल्हे हिलने लगे। जवाहरलाल नेहरू ने केंद्रीय असेंबली में आवाज बुलंद की। मोहम्मद आलम और गोपीचंद भार्गव ने पंजाब विधान परिषद से इस्तीफा दे दिया। और अतः 5 अक्टूबर 1929 को कांग्रेस पार्टी के प्रस्ताव और भगत सिंह के पिता जी के अनुरोध पर 116 दिन बाद सरदार भगत सिंह की हड़ताल खत्म की।


भगत सिंह की मृत्यु

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षड्यंत्र के केस में 24 मार्च 1931 को फांसी देने की सजा सुनाई गई थी। परंतु ब्रिटिश सरकार ने तीनों क्रांतिकारियों की सजा के समय को 11 घंटे पहले कर दिया गया ताकि आम जनता सरकार के खिलाफ कोई विद्रोह ना कर सके।


इसलिए 23 मार्च 1931 को शाम 7:30 बजे भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को लाहौर जेल में फांसी दी गई। सिंह व अन्य 2 क्रांतिकारियों की मृत्यु हो जाने के बाद जेल के अधिकारियों ने उन तीनों के शवों को रात्रि के अंधेरे में ले जाकर के गंदा सिंह वाला गांव के बाहर उनका अंतिम संस्कार कर दिया। अंतिम संस्कार के बाद उनके पुष्प चिन्हों राक्य सतलज नदी में बहा दिया गया।


जब तीनों वीर क्रांतिकारियों की भर्ती की सूचना प्रेस हुआ न्यूज़ में आए तब युवाओं ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ द्वेष जाहिर की है। कुछ सूचनाओं के  मुताबिक महात्मा गांधी को भी इस हत्याकांड का दोषी में ठहराया गया था।


FAQ

1-भगत सिंह का नारा कौन सा है?

 उत्तर-भगत सिंह मार्ग के विचारों से काफी प्रभावित थे उनका इंकलाब जिंदाबाद का नारा आज भी काफी प्रसिद्ध है इसका मतलब है कि क्रांति की जय हो इस नारे में देशवासियों में जोश भरने का काम किया था।


2-भगत सिंह को फांसी की सजा क्यों दी गई? 

उत्तर-इसके बाद करीब 2 साल तक जेल में रहना पड़ा और फिर बाद में भगत राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई इसके बाद सेंट्रल एसेंबली में बम फेंक दिया। बम फेंकने के बाद विभागीय नहीं उसके नतीजतन उन्हें फांसी की सजा हुई थी तीनों को 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल के भीतर ही फांसी दे दी गई थी।


3-भगत सिंह ने करने से पहले क्या कहा था?

 उत्तर-देश पर अपनी जान निछावर कर देने वाले शहीद ए आजम भगत सिंह ने हमेशा अपनी मां की ममता से ज्यादा भारत मां के प्रति अपने प्रेम को तवज्जो दी। उनकी आज 108 में जयंती है।


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